चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात ..........
कोहरे की धुन्ध,शबनम के आंसू बुनती , चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात.....
ओस में भीग के बहतीं किस्मत की कुछ सतरें ,
उनकी कालिख में धुल धुल के हंसती रोती पगली रात....
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात .....
रिश्तों के स्याह अंधेरों में कुछ चाहत के छिटके पल ,
ऐसे बेजान सहारे मानो कोहरे के घूँघट में हो तारों की बारात....
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात....
अँधेरे जीवन का खेत जोतती,चिहुंक उठती उजास से ,
दिन के कानों में छुप छुप के जाने क्या क्या कहती रात...
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात.......
(शील-----२८-१२-११)
कोहरे की धुन्ध,शबनम के आंसू बुनती , चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात.....
ओस में भीग के बहतीं किस्मत की कुछ सतरें ,
उनकी कालिख में धुल धुल के हंसती रोती पगली रात....
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात .....
रिश्तों के स्याह अंधेरों में कुछ चाहत के छिटके पल ,
ऐसे बेजान सहारे मानो कोहरे के घूँघट में हो तारों की बारात....
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात....
अँधेरे जीवन का खेत जोतती,चिहुंक उठती उजास से ,
दिन के कानों में छुप छुप के जाने क्या क्या कहती रात...
चाँद का कटोरा ले के भीख मांगने निकली रात.......
(शील-----२८-१२-११)
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