Tuesday, June 21, 2011

मेरे पिता : चंद सतरें


पिता स्वर्गः,पिता धर्मः,पिता ही परमं तपः , पितर प्रतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्व देवताः!!!!! फादर्स डे पर ये पंक्तियाँ परिवार में पिता की स्थिति को 
दर्शाती हैं, दरअसल पिता सभ्यता के प्रारंभ से ही अपने परिवार का केंद्र हुआ करता था,आज भी है लेकिन कुछ फर्क जरूर आया है...आज परिवार 
में सारी आर्थिक जिम्मेदारी पिता की ही नहीं रह गयी है,जहाँ माँ भी आर्थिक रूप से सम्रद्ध हैं वहां पिता की स्थिति गौड़ हो गयी है ......मुझे याद पड़ता 
है की जब हम छोटे थे तो पापा को हिटलर,धनुष बाण और राणा साहब कह कर पीछे अपनी भड़ास निकलते थे सामने बिलकुल मूक बन कर रहते 
थे  हमारी जरूरतों को माँ बताती थीं थोडा सवाल जवाब करके थोड़ी काट छांट करके जरूरत पूरी कर दी जाती थी.अब ये स्थिति नहीं है ,न तो पापा 
अब उतने भयंकर रह गए हैं और न ही बच्चे अब संवादहीनता में जी रहे हैं...लेकिन फिर भी पिता अपने बच्चों के लिए यथा संभव स्वर्ग की रचना 
तो करता ही है .आज भी पिता ही अपने बच्चे का प्रथम रोल माडल है, हालाँकि बाद में कुछ और लोग भी इस फेहरिश्त में जुड़ जाते हैं.लेकिन पहला आदर्श तो 
अब भी पिता ही है,अब ये अलग बात है की वो वैदिक पिता है या वर्तमान पिता है या उलटे पिरामिड का शिकार पिता है या फिर सोनोरा स्मार्ट डुड का
पिता या उदय प्रकाश का पिता है ....पर है वो वही भावुक, सज्जन, सह्रदय और अनुशाषित पिता जो हर दंश को मन में छुपाये अपने बच्चों की ख़ुशी 
पर  मुस्कराता है उनकी पीड़ा या असफलता पर मन में रो लेने वाला बड़े दिल वाला ही आदमी है पिता......जून के हर तीसरे रविवार को इस पिता को 
याद करके हम अपने लिए छोटे से स्वर्ग के रचनाकार को उसको देय आदर का अंश ही समर्पित करते हैं .....शायर निदा फाजली की पंक्तियों में 
"मेरी लाचारियों में तुम,मेरी नाकामियों में तुम, 
तुम्हारी कब्र पर जिसने तुम्हारा नाम लिखा है ,
वो झूठा है .....
तुम्हारी कब्र में मै दफ़न हूँ 
तुम मुझमे जिन्दा हो ,
कभी फुर्सत मिले तो फातिहा पड़ने चले आना"                                                                                                                                                                                                                                                                              (अपने पापा के नाम जो मुझे बहुत पहले छोड़ गए थे पर आज भी वे मुझमे जिन्दा हैं)

बलात्कार का मौसम : एक आंकलन


आजकल अखबारों में रेप का विशेष फैशन चल रहा है ,यही फैशन बांदा के शीलू कांड में भी आया था,क्या 
रेप का कोई मौसम होता है , या कोई गहन षड़यंत्र है इस सब का पीछे शासन को बदनाम करने का  या दोनों बाते 
हैं .......उत्तर है कि नहीं, न तो मौसम है, न ही षड़यंत्र है ....चुनावी बयार का थोडा सा असर है..... पर एक कठोर सच्चाई 
यह भी है कि औरत कि जिंदगी का सच कभी भी बदला नहीं था,देश ने अपनी केचुल में कई रंग जोड़े हैं, कुछ कथित 
प्रगतिवादी देश को महाशक्ति बनने कि ओर बढता हुआ भी बताते हैं, पर सारे देश में महिला अब भी अपनी नियति 
पर ख़ामोशी से रो रही है , स्त्रियों कि वास्तविकता में प्रगति ये हुई है कि टीवी पर गद्बदाती,खूब अघाई महिलाओं कि 
संख्या बड़ी है,कपडे त्याग कर पम्पिंग सेट के इंजन  से लेकर पुरुष कच्छों तक का विज्ञापन करती महिलाओं कि संख्या बड़ी है, असली 
प्रगति से हाथ मिला कर असलियत में अपनी हैसियत बड़ा चुकी महिलाओं कि संख्या भी १,२ प्रतिशत बड़ी है या फिर 
प्रधान पति,सरपंच पति,प्रमुख पति, सदस्य पति, विधायक पति आदि कि पत्नियों कि संख्या बड़ी है ......प्रजातंत्र का  
इससे ज्यादा बड़ा प्रहसन मैंने नहीं देखा ....पुरुष बर्चस्व के बीच सामान्य नारी का हमेशा अवमूल्यन ही हुआ है ......
और उसकी पीड़ा को हमेशा स्वर भी नहीं मिल पाता ....क्या हम कभी अपनी शुतुरमुर्गी आंख मिचौली से बाज आएंगे .......

Friday, June 10, 2011

पावस आएगा क्या ????

मुझे पता है,
तुम पावस के एक टुकड़े को
देखते हो टकटकी बांधे ,
आँखों में पाले सपने सा
नजदीकी रिश्तेदारी में गए अपने सा.
पर अब पावस भी नहीं आता बेलौस
आता है एक धुंधले कुहासे में ढका,
शरमाता,संकुचाता,लडखडाता ,
कभी किसी ठूंठ के कंधे पर
सर रख सिसकी भरता पावस
आता है.....
शहर की चौहद्दी पर ठिठकता,
धुएं से सहमता लौट जाता है,
फिर किसी दिन आने को .....
आंचल में मीठा पानी लाने को,
तुम कब तक देखोगे राह पावस की
वो आएगा तो भी आ नहीं पायेगा.........
Sheel Kumar