Friday, December 20, 2013

सरफ़रोशी की तमन्ना !!!!

भारत की स्वतंत्रता के लिये आज का दिन एक बड़ा दिन है, आजके ही दिन वर्ष १९२७ मे एक ऐसी घटना घटित हुई थी जिसने भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास मे एक नवीन अध्याय जोड़ दिया था. बहुत से साथी ९ अगस्त का महत्व जानते होंगे. उनके लिये ९ अगस्त को जापान के नागासाकी मे अणुबम गिराया गया था.
पर बहुत क़म दोस्तों को मालूम होगा की ९ अगस्त १९२५ को शाहजहाँपुर जिले से एक चिंगारी उठी थी जिसने ततकालीन ब्रिटिश सरकार की चूलें हिला दी थी। जी हाँ ९ अगस्त को शाहजहाँपुर-लखनऊ पेसेंजर जिसमे हर स्टेशन से सरकार का दैनिक राजस्‍व आता था को चंद आज़ादी के दीवानों ने काकोरी स्टेशन के पास लूट लिया था. जिसे काकोरी षड्यंत्र के नाम से जाना जाता है. यही वह घटना है जिसे हम प. रामप्रसाद बिस्मिल ,शहीद अशफाक़उल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह के स्वर्गारोहण के लिये जानते हैं.
शाहजहाँपुर की धरती के ये तीन अमर सपूत ही थे जिन्होने देश के लिये अपनी जान देने की ना केवल तैयारी की बल्कि उस समय की एक ऐसी घटना को जन्म दिया जिस के बारे मे तब कोई सोच भी नहीं सकता था. ८ अगस्त को पण्डित जी उसी गाड़ी से लखनऊ तक आये और ये देखा की इस गाड़ी से हर स्टेशन से चमड़े के बेगों मे पैसा लाया जाता था जो गार्ड के डिब्बे मे रखे एक लोहे की तिजोरी मे रखा जाता था. इसी देख भाल के बाद काकोरी केस की बुनियाद शाहजहाँपुर मे रखी गयी. हालांकि घटना के बाद काफी लोग पकड़े गये कुछ को सरकारी गवाह बनाया गया तो कुछ छोड़े भी गये पर ४ जियालों को मौत के लिये चुना गया. जिनमे से तीन लोग शाहजहाँपुर जिले के थे.
    आज जब हम बहुत सारी बातों के लिये जोश मे भरे घूमते हैं हमारा फ़र्ज़ यह भी है की आज़ादी के उन परवानों को भी याद कर ले जिन्होने देश के लिये अपनी जान किसी भावातिरेक मे नहीं दी बल्कि एक दायित्व,एक नैतिक जिम्मेदारी समझ के खुद को कुर्बान किया है.
कुछ गीत हैं जिन्होने राष्ट्रीय पहचान हासिल कर रखी है जिनमे से एक गीत प. बिस्मिल ने लिखा है " सरफ़रोशी की तमन्ना " कुछ लोग इस गीत को बिस्मिल अज़ीमाबादी की रचना भी बताते हैं पर जन मानस मे यह गीत पण्डित जी के नाम से ही जाना जाता है. अगर कभी समय अनुमती दे तो पढ़ कर dekhiyega , यह वाकई सरफ़रोशी का दस्तावेज है . 

     एक चीज़ और जिसे आज के संदर्भ मे याद दिलाना चाहूंगा कि बिस्मिल को जब लाहिरी जी की फांसी की बात बताते हुए उनकी आखिरी इच्छा पूछी गयी तो उन्होने कहा," मै लीडर था पहले मुझे फांसी दी जानी चाहिये थी" अशफाक़ साहब ने फैज़ाबाद जेल मे जवाब दिया की " आज एक मुक़द्दस दिन है जब आज़ादी के परवाने फ़ना हो रहे हैं मेरी आखिरी इच्छा है की मुझे फांसी दिये जाते समय यह ऐतिहात रखी जाये की मुझे पण्डित से पहले फांसी दे, ताकि आने वाली क़ौम याद रखे की देश के लिये जान देने मे सबसे पहले एक मुसलमान क़ुर्बान हुआ है " यह एक ऐसा खूबसूरत जवाब है जिसे हमारी हर पीड़ी को याद रखना चाहिये. विशेष रूप से वे लोग जो आज हिन्दू मुस्लिम एकता की बात करते नहीं थकते उन्हे तो यह गीता की तरह याद रखना चाहिये ......
हालांकि शहीदों की चिताओं पर मेले नहीं लगते पर कुछ भावुक लोग अगर इन्हे याद कर लेंगे तो वतन पर मिटने वालों का शायद यही बाकी निशां रहे........

Tuesday, December 10, 2013

शेखी और इतिहास मे फर्क है भाई ...

पिछले कुछ समय से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये कई कमेन्ट ऐसे डाले जा रहे हैं जिनका सम्बंध इतिहास से है ही नहीं. परंतु उन्हे इतिहास का ही एक अध्याय ही बताया जा रहा है. इसी तरह का एक लेख है चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस की बेटी हेलेना के विवाह का. जिसमे आचार्य कौटिल्य को पूर्व दृष्टा बताते हुए टिप्पणी की जा रही है. इसमे कोई संदेह ही नहीं है की आचार्यवर इतिहास के एक काल खण्ड के रचनाकार हैं. पर कॅम लोगो को मालूम होगा की चंद्रगुप्त सिकंदर की सेना मे रहे थे जहां उनका हेलेना के प्रति आसक्त होना, हेलेना की एक बांदी द्वारा देख लेना और फिर चंद्रगुप्त का तिरस्कार होना, इतिहास है. यह सभी को मालूम है की महानंद के बाद सेल्यूकस को पराजित करके चंद्रगुप्त इतिहास के बड़े नायक बन गये.पर सेल्यूकस से सन्धि वॅ हेलेना से विवाह के समय आचार्य वहां नहीं थे.
      कल रात मुझे इस विषय पर लिखने का आदेश दिया गया था मेरे एक आदरणीय द्वारा सो मैने लिख दिया, परिहास यह रहा की कहने वाले वरीय बंधु ने उसको अनदेखा ही कर दिया. मै इस पर विवाद या बहस नहीं चाहता पर जो लिखा है उसे सब के सामने लाकर इतिहास और शेखीखोरी मे अंतर स्थापित करना चाहता हूँ .......
               मै इतिहासकार नहीं हूँ पर इतिहास और शेखी के अंतर को आसानी से पचा नहीं पाता इसलिये लिख दिया है.
फिर भी आपको बताना चाहूंगा की एक लम्बे युद्ध के बाद चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को ईसा से ३०५ वर्ष पूर्व युद्ध मे पराजित किया. लम्बे समय से अपने देश से दूर भारतीय उपमहाद्वीप मे रह रहे यूनानी सैनिकों के पल पल क्षीण होते मनोबल को बनाये रखने के लिये जरूरी था कि सेल्यूकस यूनान वापस चला जाता. एशिया के अपने युद्ध अभियान के दौरान अर्जित संपदा को ले जाने के लिये परिवहन के अतिरिक्त उसे सुरक्षित मार्ग की भी अवश्यकता थी. इसलिये उसने चंद्रगुप्त वॅ उनके प्रधान आमात्य चाणक्य से सन्धि की और सन्धि के अनुसार सेल्यूकस की पुत्री हेलेना और उसके साथ अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक का साम्राज्य चंद्रगुप्त को दे दिया और स्वयं सुरक्षित यूनान चल दिया हालांकि मार्ग मे हीं उसकी हत्या उसके ही एक सरदार द्वारा कर दी गयी थी .
कालांतर मे हेलेना को मलय राजकुमारी छाया वॅ चंद्रगुप्त के प्रेम के विषय मे जानकारी होने पर उसने ही छाया का विवाह चंद्रगुप्त से करा दिया और इस हिन्दू रानी से उत्पन्न पुत्र बिन्दुसार ही चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी हुआ. इसे चाणक्य के प्रभाव के स्थान पर चंद्रगुप्त का जैन धर्म मे दीक्षित हो जाना और पाटलिपुत्र छोड़ कर कर्नाटक चला जाना अधिक सत्यता के निकट है। क्योकि उस समय तक चाणक्य की कीर्ति पताका का अवसान भी हो चुका था.........