Tuesday, December 10, 2013

शेखी और इतिहास मे फर्क है भाई ...

पिछले कुछ समय से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिये कई कमेन्ट ऐसे डाले जा रहे हैं जिनका सम्बंध इतिहास से है ही नहीं. परंतु उन्हे इतिहास का ही एक अध्याय ही बताया जा रहा है. इसी तरह का एक लेख है चंद्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस की बेटी हेलेना के विवाह का. जिसमे आचार्य कौटिल्य को पूर्व दृष्टा बताते हुए टिप्पणी की जा रही है. इसमे कोई संदेह ही नहीं है की आचार्यवर इतिहास के एक काल खण्ड के रचनाकार हैं. पर कॅम लोगो को मालूम होगा की चंद्रगुप्त सिकंदर की सेना मे रहे थे जहां उनका हेलेना के प्रति आसक्त होना, हेलेना की एक बांदी द्वारा देख लेना और फिर चंद्रगुप्त का तिरस्कार होना, इतिहास है. यह सभी को मालूम है की महानंद के बाद सेल्यूकस को पराजित करके चंद्रगुप्त इतिहास के बड़े नायक बन गये.पर सेल्यूकस से सन्धि वॅ हेलेना से विवाह के समय आचार्य वहां नहीं थे.
      कल रात मुझे इस विषय पर लिखने का आदेश दिया गया था मेरे एक आदरणीय द्वारा सो मैने लिख दिया, परिहास यह रहा की कहने वाले वरीय बंधु ने उसको अनदेखा ही कर दिया. मै इस पर विवाद या बहस नहीं चाहता पर जो लिखा है उसे सब के सामने लाकर इतिहास और शेखीखोरी मे अंतर स्थापित करना चाहता हूँ .......
               मै इतिहासकार नहीं हूँ पर इतिहास और शेखी के अंतर को आसानी से पचा नहीं पाता इसलिये लिख दिया है.
फिर भी आपको बताना चाहूंगा की एक लम्बे युद्ध के बाद चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस को ईसा से ३०५ वर्ष पूर्व युद्ध मे पराजित किया. लम्बे समय से अपने देश से दूर भारतीय उपमहाद्वीप मे रह रहे यूनानी सैनिकों के पल पल क्षीण होते मनोबल को बनाये रखने के लिये जरूरी था कि सेल्यूकस यूनान वापस चला जाता. एशिया के अपने युद्ध अभियान के दौरान अर्जित संपदा को ले जाने के लिये परिवहन के अतिरिक्त उसे सुरक्षित मार्ग की भी अवश्यकता थी. इसलिये उसने चंद्रगुप्त वॅ उनके प्रधान आमात्य चाणक्य से सन्धि की और सन्धि के अनुसार सेल्यूकस की पुत्री हेलेना और उसके साथ अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक का साम्राज्य चंद्रगुप्त को दे दिया और स्वयं सुरक्षित यूनान चल दिया हालांकि मार्ग मे हीं उसकी हत्या उसके ही एक सरदार द्वारा कर दी गयी थी .
कालांतर मे हेलेना को मलय राजकुमारी छाया वॅ चंद्रगुप्त के प्रेम के विषय मे जानकारी होने पर उसने ही छाया का विवाह चंद्रगुप्त से करा दिया और इस हिन्दू रानी से उत्पन्न पुत्र बिन्दुसार ही चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी हुआ. इसे चाणक्य के प्रभाव के स्थान पर चंद्रगुप्त का जैन धर्म मे दीक्षित हो जाना और पाटलिपुत्र छोड़ कर कर्नाटक चला जाना अधिक सत्यता के निकट है। क्योकि उस समय तक चाणक्य की कीर्ति पताका का अवसान भी हो चुका था.........

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