आजकल अखबारों में रेप का विशेष फैशन चल रहा है ,यही फैशन बांदा के शीलू कांड में भी आया था,क्या
रेप का कोई मौसम होता है , या कोई गहन षड़यंत्र है इस सब का पीछे शासन को बदनाम करने का या दोनों बाते
हैं .......उत्तर है कि नहीं, न तो मौसम है, न ही षड़यंत्र है ....चुनावी बयार का थोडा सा असर है..... पर एक कठोर सच्चाई
यह भी है कि औरत कि जिंदगी का सच कभी भी बदला नहीं था,देश ने अपनी केचुल में कई रंग जोड़े हैं, कुछ कथित
प्रगतिवादी देश को महाशक्ति बनने कि ओर बढता हुआ भी बताते हैं, पर सारे देश में महिला अब भी अपनी नियति
पर ख़ामोशी से रो रही है , स्त्रियों कि वास्तविकता में प्रगति ये हुई है कि टीवी पर गद्बदाती,खूब अघाई महिलाओं कि
संख्या बड़ी है,कपडे त्याग कर पम्पिंग सेट के इंजन से लेकर पुरुष कच्छों तक का विज्ञापन करती महिलाओं कि संख्या बड़ी है, असली
प्रगति से हाथ मिला कर असलियत में अपनी हैसियत बड़ा चुकी महिलाओं कि संख्या भी १,२ प्रतिशत बड़ी है या फिर
प्रधान पति,सरपंच पति,प्रमुख पति, सदस्य पति, विधायक पति आदि कि पत्नियों कि संख्या बड़ी है ......प्रजातंत्र का
इससे ज्यादा बड़ा प्रहसन मैंने नहीं देखा ....पुरुष बर्चस्व के बीच सामान्य नारी का हमेशा अवमूल्यन ही हुआ है ......
और उसकी पीड़ा को हमेशा स्वर भी नहीं मिल पाता ....क्या हम कभी अपनी शुतुरमुर्गी आंख मिचौली से बाज आएंगे .......
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