वर्ष २००४ में मणिपुर की महिलाओं द्वारा जुलाई २००४ में पूर्वोत्तर क्षेत्र में आतंकवाद के खात्मे के लिए सुरक्षा बलों को दिए गए असीमित अधिकारों और उनकी
आड़ में सुरक्षा बलों द्वारा महिलाओं के जन उत्पीडन के विरोध में आबाज उठाने वाली टी० मनोरमा की कथित बर्बर हत्या के प्रतिरोध में प्रदर्शन स्वरुप मणिपुर में
स्त्रीयों ने पुलिस मुख्यालय के सामने पूरी तरह निर्वस्त्र होकर किये गए प्रदर्शन को ही भारत का पहला स्लट वाक् माना जाना चहिये ! हांलाकि इस स्लट वाक् में निर्वस्त्र
होने के वावजूद भी इसे श्लीलता अथवा अश्लीलता की बहस में नहीं लाया गया बल्कि इसे जन व्यथा के प्रतिकार स्वरुप की गयी एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया माना गया है !
दरअसल स्लट वाक् का प्रारम्भ कनाडा से हुआ है जहाँ एक पुलिस अधिकारी की अशोभनीय टिप्पणी के विरोंध स्वरुप इस चहलकदमी का आयोजन किया गया था !
जिसको व्यापक चर्चा तो मिली ही , विरोंध प्रदर्शन का यह तरीका ग्लोब के अन्य हिस्सों तक भी जा पहुंचा ! जहाँ तक स्लट शब्द का अर्थ है,यह कुल्टा और फाहशा स्त्री के सन्दर्भ
में प्रयोग किया जाता है ! यधपि महिलायों के जो समूह इस चहल कदमी से जुड़े हुए है, उनके अनुसार ये नारी मुक्ति विमर्श ,स्त्री अस्मिता और लडकियों की आजादी का
न्याय संगत प्रदर्शन मात्र है ! जिसका आयोजन बेशर्मी मोर्चा नामक संगठन द्वारा किया जा रहा है !
भारत एक पारंपरिक मूल्यों का देश है जहाँ नारी आस्मिता की संदर्भगत व्याख्या को शुचिता के भाव से लिया जाता है ! हालांकि इस पर आगें बढ़ने से पहलें में मोर्चे
से सम्वद्ध समूह तथा नारी विमर्श की पुरोधाओ से पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ जो पहले ही इसे पितृसत्तात्मक मनोवृति का परिचायक घोषित कर देगीं ! मेरा अत्यंत विनम्र निवेदन है
कि मैं ऐसे किसी पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं हूँ वैसे भी हमारे इस परंपरागत देश में सेकड़ो बिरोधाभास और असंख्य सामाजिक विकृतियाँ पल रही है तो यह बिरोधाभाष भी पल सकता है!
लेकिन यह आयोंजन चौराहे पर किया जाना है और बरास्ते चौराहे हमारे घरो में प्रवेश करेंगा इसलिए इस पर विस्तार से खुली चर्चा आवश्यक मानते हुए यह टिप्पणी लिख रहा हूँ !
हालाँकि स्त्री को कुछ श्लोक, कुछ कुटिलता भरी मान्यताएं देकर लम्बे समय से छला जा रहा है! इसका आदि और अंत भी अज्ञात है !
मेरा अपना मानना ये है कि स्त्री ही नहीं प्रत्येक विवेकशील प्राणी को उसके प्रति हो रहे हमले का प्रतिकार करने का अधिकार निश्चित रूप से है! दरअसल विरोध या प्रतिकार
किसी भी जीवित जाति कि अपनी पहचान है !लेकिन पहले हमें ये जान लेना जरूरी होगा कि एक अतिरेक का उत्तर दुसरे अतिरेक से देना सहज स्वीकार्य है या नहीं !पुरुष बर्चस्व के चलते
समाज में पुरुषों द्वारा स्त्रियों का अनेक रूपों में शोषण किया जाना हर दिन प्रकाश में आता है! लेकिन इसके चलते हम सारे पुरुषों को दोषी नहीं ठहरा सकते हैं! ठीक उसी प्रकार से स्लट
शब्द का प्रयोग हर स्त्री पर नहीं किया जा सकता ! किसी भी उपचार को शुरू करने से पहले यह जरूरी है कि हम उसके पार्श्व प्रभावों का भी मूल्यांकन कर लें और यह भी देख लें कि यह
उपचार ग्रहण किये जाने के योग्य है अथवा नहीं !स्लट वाक् भी वास्तव में एक क्रोध के अतिरेक से भरी प्रतिक्रिया है जो चौकाने या मर्म पर प्रहार कर जगाने का प्रयास मात्र ही है!किन्तु
इसकी भी अपनी सीमाएं हैं! क्रोध या मर्म पर चोट करना एक तरह का आवेग ही है ,और कोई भी आवेग लम्बी दूरी तक नहीं जाता है ! हर समाज कि अपनी नैतिक धारणाएं होती हैं, जो समय
के साथ बदलती भी हैं!परन्तु उन्हें एक झटके में नहीं बदला जा सकता,और स्लट वाक् यही करने का प्रयास कर रहा है !देश में महिला उत्पीडन कि समस्या तो है लेकिन उसके लिए विवस्त्र होकर
नंगी चहलकदमी करना समस्या का हल नहीं है बल्कि समस्या को बेढंगा स्वरुप देने का प्रयास जरूर है! मुझे ये भी ताज्जुब है कि औरत ही स्लट वाक् का आयोजन करके न केवल औरत को
बेपर्दा कर रही है बल्कि औरत की देह को प्रदर्शन की वस्तु के रूप में भी प्रस्तुत कर रही हैं ! यह स्थिति स्वस्थ नहीं है और नारी स्मिता को नंगा करने का प्रयास भी है ! यह पुरुष बर्चस्व को
साहिल के तमाशाई के रूप में और मजे लेने का अवसर भी प्रदान करता है!
स्लट वाक् एक अतिवादी प्रतिक्रिया है जो आक्रोश और निराशा की चरम अभिव्यक्ति भी है ! मुझे तो नहीं लगता कि इस वाक् से सहम के कोई गन्दा पुरुष अपनी खोह में जा छुपेगा बल्कि यह
उसकी जुगुप्सा को उत्तेजित करने का एक माध्यम जरूर बन जायेगा ! स्त्री को उसकी दुर्दशा ने झकझोरा तो है किन्तु उसका विरोध करने के पहले हमें ये भी देखना होगा कि जिन साधनों का हम
प्रयोग करने जा रहे हैं वे समाज कि नैतिक अवधारणा के अनुरूप हैं भी या नहीं, यदि नहीं भी हैं तो क्या इसके अलावा अन्य कोई उचित साधन अब शेष नहीं रहा है तथा क्या प्रतिपक्ष से
सकारात्मक बदलाव कि उम्मीद भी है या नहीं ?? स्लट वाक् एक अतिरेकी तरीका होने के कारण इसके साथ एक समस्या यह भी है कि अपेक्षित परिणाम प्राप्त न होने पर आगे फिर क्या किया
जायेगा ????जिस तरह से गंदगी से सफाई पैदा नहीं कि जा सकती उसी प्रकार असभ्यता से सभ्यता भी नहीं खरीदी जा सकती है ! यही वह कारण है जिस पर हम सब को खुले दिल से
विचार करना होगा !!!!!!!
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